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100 दिन पूरे, रफ्तार पकडऩी अभी बाकी

सुस्त चाल और उपलब्धियों के सन्नाटे से सरकार नहीं छोड़ पायी छाप
उत्तरांचल दीप ब्यूरो
देहरादून। उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार रविवार को 100 दिन की हो गई है। कामकाज या कार्यकाल के इस पहले शतक में सरकार ठीक से रफ्तार तक नहीं पकड़ पाई है। मंत्रियों के व्यक्गित कामकाज को लें तो चुनिंदा नाम ही जुबान पर आ पाए हैं, जबकि ओवरऑल सरकार की परफॉरमेंस अभी जनता जर्नादन पर अपनी छाप नहीं छोड़ पाई है। बीजेपी के चुनावी घोषणा पत्र (दृष्टि पत्र-2017) के कई वायदे पाइप लाइन में ही पड़े हैं। कुछ मुद्दों पर आगे चलने की बजाए सरकार की उलटी चाल रही तो पुरानी सरकार के कई फैसलों पर अमल भी किया। उपलब्धियों के नाम पर 100 दिन पूरे होने से चंद रोज पहले राजधानी देहरादून का स्मार्ट सिटी के लिए चयन और एनएच-74 घोटले की सीबीआई जांच की मंजूरी रही। राजधानी में अतिक्रमण के खिलाफ सख्ती से मुहिम चलाकर सरकार ने अपनी दृढ इच्छाशक्ति जरूर दिखाई। हर माह कैबिनेट की नियमित बैठक सुनिश्चित करने के साथ ही सीएम आवास और बीजेपी मुख्यालय में सीएम के जनता दर्शन कार्यक्रमों का आयोजन भी सरकार के गुड वर्क में गिना जा सकता है।
प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई बीजेपी ने 18 मार्च को पुराने संघी त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व में सरकार का गठन किया। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र के साथ सात विधायक बतौर कैबिनेट मंत्रियों और दो विधायक राज्य मंत्रियों (स्वतंत्र प्रभार) के तौर पर सरकार हिस्सा बने। रविवार को त्रिवेंद्र सरकार के 100 दिन पूरे हो जाएंगे। इसी के साथ सरकार ने दिनों का शतक भले ही पूरा कर लिया है, मगर इस पूरी अवधि में अभी सरकार का कामकाज रफ्तार नहीं पकड़ पाया है। आमजन के बीच प्रभाव छोडऩे में सरकार उस हद तक सफल नहीं हो पाई, जिसकी अपेक्षा में प्रदेश के लोगों ने प्रचंड बहुमत दिया था। यूपी में योगी सरकार की काम संभालते ही तेज रफ्तार से शुरूआत की तो उत्तराखंड में सरकार की शरूआती चाल सुस्त रही। उपलब्धियों और बड़े फैसलों के नाम पर 100 दिन में सरकार दस ठोस कदम भी नहीं बढ़ा सकी तो कई मुद्दों पर कामकाज और फैसलों ने विवाद जरूर पैदा किया।
100 दिन में लोकायुक्त और कर्जमाफी ?
देहरादून। बीजेपी ने अपने दृष्टि पत्र-2017 में सरकार बनने के लिए सौ दिन के भीतर लोकायुक्त कानून को प्रभावी तरीके से लागू कर लोकायुक्त की नियुक्ति की बात कही थी। लोकसेवक स्थानांतरण एक्ट लागू करने, सीमांत व लघु किसानों को कर्ज माफी और गन्ना किसानों को भुगतान का भरोसा दिलाया था। बंजर भूमि के विकास को विशेष कार्ययोजना, नई पर्यटन और युवा नीति बनाने, मेडिकल टूरिज्म को विकसित करने, टेली-मेडिसन की सुविधा देने का जिक्र भी प्रमुखता से किया था। मगर, इन बिंदुओं पर सौ दिन में सरकार मजबूत कदमों के साथ आगे नहीं बढ़ी। लोकायुक्त और ट्रांसफर बिल विधानसभा से बाहर नहीं निकल पाया है। जबकि, गन्ना किसानों का करोड़ों का भुगतान अभी बाकी है। किसानों की कर्ज माफी के सवाल पर सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं। नई पर्यटन और युवा नीति अभी बनने की प्रक्रिया में ही उलझी है। पलायन और रोजगार सृजन के क्षेत्र में भी सरकार का ठोस रोडमैप अभी तक धरातल पर मूर्तरूप लेता नहीं दिखा है।
हाईकोर्ट से मिले झटके-दर-झटके
देहरादून। कई मामलों में जल्दबाजी में उठाए गए कदम भी त्रिवेंद्र सरकार पर भारी पड़े। बदरी केदार मंदिर समिति को भंग करने के आदेश पर हाईकोर्ट ने पहले रोक लगा दी और बाद में उसी समिति को बहाल कर दिया। कोर्ट ने इस बारे में सरकार के दूसरे आदेश को भी दर कर दिया। इसी कड़ी में हाईकोर्ट ने मंडी समितियों को भंग करने के आदेश पर भी रोक लगा दी।
विवाद की छाया में बना रिकार्ड
देहरादून। विधानसभा में बजट सत्र के अंतिम दिन 15 जून को सदन की कार्यवाही आधी रात तक चलाकर सत्तापक्ष इतिहास रचने में तो कामयाब रहा, मगर रिकार्ड के साथ कई विवाद भी अपने पीछे लगा लिए। एक दिन में करीब 11 घंटे 58 मिनट चली सदन की इस कार्यवाही में अंतिम समय में बजट पारित कराने के साथ सत्ता पक्ष ने आनन-फानन में लोकायुक्त और ट्रांसफर बिल पर प्रवर समितियों के प्रतिवेदन सहित ढैंचा बीच प्रकरण की जांच रिपोर्ट को भी सदन पटल पर रख दिया। विपक्ष ने सत्तापक्ष पर बहुमत के दम पर मनमानी करने सहित सदन की मर्यादाओं का उल्लंघन करने के आरोप लगाए। विपक्ष ने सदन की कार्यमंत्रणा समिति की बैठकों में शामिल न होने का ऐलान किया। प्रदेश विधानसभा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है।
शराब और खनन पर सवाल अभी बरकरार
देहरादून। शराब और खनन के मुद्दों तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर जमकर हमला बोलने वाली बीजेपी अपनी सरकार के सौ दिनों में उठने वाले सवालों को नहीं दबा पाई। शराब व खनन कारोबार के हितों का सवाल आया तो तीन जिलों में शराबबंदी और गंगा किनारे खनन पर पाबंदी के मुद्दे पर सरकार हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की शरण में चली गई। शराब की बिक्री के लिए हाइवे का दर्जा घटाकर उन्हें जिला मार्गों में तब्दील करने का फैसला भी विवादित रहा। नई शराब नीति लाकर पर्वतीय जिलों में शराब की बिक्री के लिए नया समय निर्धारित करने की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। इसके अलावा प्रदेशभर में शराब की दुकानों के खिलाफ महिलाओं के प्रदर्शन फिलहाल जारी है।
मंत्रियों की परफॉरमेंस भी लचर
देहरादून। गिनती के तीन-चार मंत्रियों को छोड़ दें तो अन्य मंत्रियों की परफॉरमेंस इन 100 दिनों में किसी तरह की छाप छोडऩे वाली नहीं रही है। विद्यालयी शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे, शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक और उच्च शिक्षा मंत्री डा धन सिंह रावत अपने कामकाज और फैसलों को लेकर लगातार चर्चाओं में है। दून शहर में अतिक्रमण के खिलाफ पूरी सख्ती के साथ मुहिम चलाकर और अरविंद पांडेय की प्राइवेट स्कूलों पर नकेल कसने के साथ ही सरकारी स्कूलों की दशा-दिशा सुधारने की कवायद, उच्च शिक्षा और सहकारिता के क्षेत्र में डा धन सिंह रावत के कई अहम फैसले लोगों को कुछ उम्मीद बंधाते दिख रहे हैं। वरिष्ठ काबीना मंत्री प्रकाश पंत विधानसभा के भीतर सत्तापक्ष का मोर्चा मजबूती से संभालने और सरकारी कामकाज से जुड़े हर अहम मसले पर अपनी गंभीरता को लेकर सुर्खियों में हैं।
गैरसैंण पर इरादे नहीं हो पाए साफ
देहरादून। त्रिवेंद्र सरकार इन 100 दिनों में गैरसैंण पर अपने ठोस इरादे साफ नहीं कर पाई है। सदन से पारित संकल्प के बावजूद बजट सत्र दून में ही कराकर सरकार ने गैरसैंण के मुद्दे को फिर से गर्माने का मौका विपक्ष को दिया है। अब सरकार गैरसैंण में पहले अवस्थापनाओं का ठोस ढांचा खड़ा करने और फिर अपने स्टैंड पर दृढ़ता से आगे बढऩे का हवाला तो दे रही है, मगर प्रदेश में खासकर पर्वतीय जनमानस में इस मुद्दे पर सरकार अपना स्पष्ट संदेश नहीं दे पाई है। नए जिलों के गठन पर सरकार की रहस्यमयी चुप्पी 100 दिनों में नहीं टूट पाई है।

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