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183 राइस मिलों पर लटके ताले

अभिषेक आनंद
रुद्रपुर। एक तरफ राज्य में औद्योगिक माहौल बनाने को ‘इनवेस्टर्स समिट’ की तैयारियां चल रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखकर सरकार राज्य में औद्योगिक घरानों को बुलावा भेज रही है। दूसरी ओर राज्य की रीढ़ कहे जाने वाले चावल उद्योग को सरकार की लालफीताशाही खा गई है। पिछले साल की तुलना में इस साल मात्र .5 प्रतिशत धान खरीद हुई। चावल उद्योग बुरी तरह लड़खड़ा गया। नतीजा ये रहा कि राज्य में स्थित 670 राइस मिल में 183 राइस मिलों पर ताले लटक चुके हैं। अब नये सीजन में भी धान खरीद के यही हालात रहे तो कोई बड़ी बात नहीं है कि राज्य में चावल उद्योग खत्म ही हो जाएगा।
उत्तराखंड की पहचान शुरु में चावल उद्योग से ही हुआ करती थी। तराई का शरबती हो या फिर देहरादूनी बासमती सभी की खूशबू देश ही नहीं विदेश तक फैलती थी। आम आदमी की रसोई में बनने वाले ‘इंद्रासन’ चावल की पैदाइश भी इसी तराई से शुरू हुई। राज्य का चावल उद्योग देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल, ऊधम सिंह नगर व चंपावत जिलों में फैला हुआ है। लेकिन सरकार की काहिली के चलते इस वक्त चावल उद्योग सबसे बुरे दौर में गुजर रहा है। दरअसल, पिछले साल धान खरीद को लेकर सरकार कोई निर्णय ही नहीं ले पाई। इसी की वजह से ये हालात बन गए हैं। वर्ष 2017-18 में सरकार ने मात्र 53 हजार मीट्रिक टन धान की खरीद की। जबकि वर्ष 2016-17 में ये खरीद तकरीबन 11 लाख मीट्रिक टन थी। इसी वजह से न तो सरकार राइस मिलों को कुटाई के लिए अपेक्षित धान दे पाई और न ही उनसे लेवी खरीद पाई। इसी की वजह से राज्य की 670 में इस साल 183 राइस मिलों पर ताले लटक गए।

 

बाकी आगे बढ़े और हम पीछे
उत्तराखंड में धान खरीद में तकरीबन 95 प्रतिशत की कमी आई है। इसके सापेक्ष पड़ोसी राज्य हरियाणा व पंजाब की बात करें तो वहां क्रमश: 22 व 13 प्रतिशत धान पिछले साल की तुलना में ज्यादा खरीदा गया। कहा जा रहा है कि उत्तराखंड सरकार ने आढ़तियों को धान खरीद से बाहर कर दिया। सरकार अपने संसाधन जुटा नहीं पाई। इसकी वजह से धान खरीद रफ्तार नहीं पकड़ पाई। बिचौलियों ने औने-पौने दाम पर धान खरीद कर मनमानी दिखाई लेकिन सरकारी तंत्र कानों में तेल डाल सोता रहा। इन सबके बावजूद भी किसानों को तीन महीने तक अपनी फसल के मूल्य के लिए भटकना पड़ा।

दूसरे उद्योगों पर भी पड़ा असर
ऐसा नहीं है कि धान खरीद न होने से राज्य में राइस मिलों पर ही मार पड़ी है। इससे दूसरे उद्योग भी प्रभावित हुए हैं। राइस से साल्वेंट, रिफायनरी उद्योग जुड़ा है। तमाम औद्योगिक इकाइयों में ब्वायलर भी धान की भूसी से ही चलते हैं। इन उद्योगों का भी प्रभावित होना स्वाभाविक था। धान की भूसी इस साल पांच सौ रुपये कुंटल तक बिकी। जबकि पिछले सालों तक ये ढाई सौ रुपये कुंटल में आसानी से उपलब्ध थी। पांच सौ रुपये कुंटल की खरीद भी यूपी, हरियाणा से की गई। इसका भाड़ा अलग से देना पड़ा। इसी का परिणाम हैं कि तमाम उद्यमियों ने भूसी आधारित अपने ब्वायलर को बदलवाना शुरू कर दिया है। इसमें भी करोड़ों का खर्च आ रहा है।

अभी भी नहीं चेती सरकार
एक तरफ तो सरकार उद्यमियों को राज्य में बुला रही है लेकिन अपने इस पैतृक उद्योग को बचाने के लिए सरकार कोई प्रयास करती नजर नहीं आ रही है। सात अक्टूबर को इनवेस्टर्स समिट का माहौल बनाने के लिए राज्य में कई स्थानों पर बैठकें की जा रही हैं लेकिन एक अक्टूबर से शुरू होने वाले धान खरीद सीजन के लिए कोई तैयारियां नहीं है। कारोबारियों की मांग है कि पंजाब व हरियाणा की तर्ज पर ही धान खरीद कराई जाए लेकिन सरकार अभी इस मामले में गंभीर नहीं दिख रही है।

सरकारी खजाने को 350 करोड़ का खर्च
धान खरीद में हीलाहवाली से राज्य में हजार करोड़ के टर्नओवर का नुकसान हुआ है। यदि पिछले साल की तरह ही धान खरीद होती तो सरकारी खजाने में ही तकरीबन साढ़े तीन करोड़ का राजस्व जाता। आय के अपने संसाधन बढ़ाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नसीहत के बाद भी सरकार नहीं चेती और इतनी मोटी धनराशि का नुकसान उठाना पड़ा।

रोजगार के मोर्चे भी लगी पटकी
राइस मिल कारोबार से जुड़े लोगों की मानें तो धान खरीद न होने से राइस मिलर्स को तो नुकसान हुआ ही है। लेकिन राइस मिलें बंद होने से तकरीबन डेढ़ लाख लोग बेरोजगार हुए हैं। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो राइस मिलों में छंटनी का शिकार हुए हैं। अब इन लोगों के पास किसी कंपनी में मजदूरी के सिवाय कोई चारा नहीं है।
ऐसे समझें धान खरीद व राइस मिलों का संबंध
एक अक्टूबर से जनवरी या फरवरी तक सरकार की ओर से धान खरीद की जाती है। सरकार जो धान खरीद करती है। उसेे कुटाई यानी चावल बनाने के लिए राइस मिलों को देती है। इसके एवज में कुटाई की रकम सरकार राइस मिलर्स को देती है। इसी चावल को सरकार अपनी योजनाओं में बांटती है। चूंकि धान खरीद न्यूनतम हुई। इसलिए राइस मिलों को धान मिला ही नहीं। आढ़तियों के माध्यम से जब सरकारी खरीद होती है तो राइस मिलर्स सुगम तरीके से धान खरीदते हैं और उसे सरकारी आंकड़े में दर्ज कराते हैं लेकिन इस बार सरकार ने इस व्यवस्था को खत्म कर दिया। दूसरी व्यवस्था चालू नहीं हो सकी और धान खरीद व्यवस्था पंगु हो गई।

ये अच्छी बात है कि अब सरकार इनवेस्टर्स समिट के बहाने उद्यमियों की बात सुन रही है लेकिन धान खरीद को लेकर जो कुछ हो रहा है। उसका जिम्मेदार कौन है, इससे राइस मिलर्स ही नहीं किसान भी परेशान हुए हैं। उनकी उपज को औने-पौने दामों में खरीदा गया है। अब सरकार को चेतना चाहिए। हम इस मुद्दे को सीएम के सामने उठा रहे हैं। शनिवार को रुद्रपुर में हुई समिट में हमने ये मामला अफसरों के सामने उठाया था।
-अशोक बंसल, अध्यक्ष, केजीजीसीआई।
‘सरकारी धान खरीद व चावल उद्योग एक-दूसरे के पूरक हैं। हम बगैर किसी सब्सिडी व मदद के चावल उद्योग चलाते हैं। इसके बाद भी सरकार को हम पर ध्यान देना चाहिए। अभी तो 183 राइस मिलें बंद हुई हैं यदि इस साल भी यही हालात रहे तो इस साल भी दो सौ से ज्यादा राइस मिलों पर ताले लटक जाएंगे।
-सचिन गोयल, अध्यक्ष, उत्तराखंड राइस मिलर्स एसोसिएशन

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