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आधी-अधूरी व्यवस्थाएं, मुश्किल है शिक्षा की अलख जगाना!

सलीम खान
हल्द्वानी। शिक्षा मनुष्य को समाज में रहने के तौर-तरीकों से अवगत कराती है। इसके अलावा शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जिससे हम सामाजिक कु रीतियों व अंधविश्वास के खिलाफ समाज को खड़ा कर सकते हैं। पर आजादी के इतने वर्षों के बावजूद हम जहां से शुरू हुए थे उस स्थिति में कोई ज्यादा सुधार नहीं हो पाया है। कहने का तात्पर्य यह है कि आज भी शिक्षा जन सुलभ नहीं बन सकी है। जबकि शिक्षा के नाम पर हर साल करोड़ों रुपए की योजनाएं बन रही हैं, लेकिन धरातल पर उतरते ही दम तोड़ती नजर आ रही हैं। कहने को तो अपने यहां प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा मिला हुआ है पर हकीकत में यह अधिकार पन्नों तक सीमित होकर रह गया है। रही-सही कसर शिक्षा के बाजारवाद और निजीकरण ने पूरी कर दी है। दिनों-दिन महंगी हो रही शिक्षा आम आदमी के ब’चों के लिए दूर की कौड़ी साबित हो रही है। खासकर गरीब मजदूर और मलिन बस्ती में रहने वाले परिवारों के ब’चों के लिए वर्तमान दौर में शिक्षा हासिल करना एक सपना बन गया है। हालांकि सरकार ने इन ब’चों को शिक्षा से जोडऩे के लिए विशेष योजनाएं भी बनायी हैं पर वहां पर ईमानदारी व जिम्मेदारी के अभाव में योजना का ढोल पीटने तक सीमित है। दम तोड़ रही इन योजनाओं से प्रदेश के लोगों की मेहनत की गाढ़ी कमाई का कुछ अंश सरकार के खजाने के तौर पर बर्बाद हो रहा है। वहीं इन गरीब मजदूर व मलिन बस्तियों के ब’चों का भविष्य भी रोजी-रोटी की भूख तक सीमित होकर रह गया है। ऐसे हालात में वह शिक्षा की ओर कैसे उन्मुख होंगे। इन बस्तियों के ब’चे आज भी शिक्षा से काफी हद तक वंचित हैं। इन बस्तियों में मौजूद हालात की यदि पड़ताल की जाए तो तस्वीर खुदबखुद कहानी बयां कर देती है। पर एक बात जो अ’छी है निरक्षर अभिभावकों का भी शिक्षा के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। वहीं सरकार का रुख ठीक विपरीत है। 2001 में गरीब व मजदूर ब’चों को शिक्षा से जोडऩे के लिए ‘मुस्कानÓ योजना शुरू की गयी थी। पर सरकारी लापरवाही के चलते 2009 में इस योजना ने दम तोड़ दिया। सरकार ने पुन: प्रयास करते हुए 2012 में दूसरे नाम स्पेशल ट्रेनिंग सेंटर व विशेष प्रशिक्षण केंद्र के  नाम से योजना शुरू की जो अभी कछुआ गति से चल रही है कब दम तोड़ दे कहा नहीं जा सकता।

47 सेंटरों से दी जा रही गरीब ब’चों को शिक्षा
हल्द्वानी। मुख्य शिक्षा अधिकारी केके गुप्ता ने बताया कि गरीब व मजदूर तबके के लोगों के 6-14 वर्ष तक ब’चों तक शिक्षा की पहुंच बनाने को स्पेशल ट्रेनिंग सेंटर व विशेष प्रशिक्षण केंद्र के नाम से एक योजना की शुरुआत 2012 में की गयी है। इस योजना के तहत प्रदेश भर में 47 सेंटर चल रहे हैं। जिससे उत्तराखंड में 1700 ब’चे लाभान्वित हो रहे हैं। देहरादून व हरिद्वार के सेंटरों में सबसे अधिक ब’चे पढ़ रहे हैं। गरीब परिवारों के ब’चों को मलिन बस्तियों में जाकर दो शिक्षक पढ़ाते हैं ताकि वे भी समाज की मुख्य धारा से जुड़ सकें। हल्द्वानी नगर में इस समय 88 ब”ो उक्त योजना का लाभ उठा रहे हैं जिनमें से करीब दर्जन भर ब’चों का प्राइमरी पाठशाला में दाखिला कराया जा रहा है। इसी तरह इनकी पढ़ाई का कुछ वहन भी सरकार द्वारा किया जाता है।

सचल शिक्षा दे रहे दो वाहन
हल्द्वानी। इस योजना के प्रचार-प्रसार को उत्तराखंड के कुमाऊं व गढ़वाल मंडल में दो वाहन हैं पर यह वाहन कुमाऊं मंडल में अपनी सेवाएं ज्यादा नहीं दे सके। वर्तमान में दोनों वाहन गढ़वाल मंडल में हैं, जो जगह-जगह जाकर ब’चों को शिक्षा सुलभ करा रहे हैं।

आंकड़ों व हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर
हल्द्वानी। जहां सरकार इस योजना पर भारी-भरकम धनराशि खर्च कर रही है वहीं आज भी गरीब व मजदूर तबके के मासूम ब’चे होटलों, ढाबों में मजदूरी करने के अलावा कूड़ा-करकट बीनते नजर आ रहे हैं। इन ब’चों का भविष्य अंधकार में डूबता नजर आ रहा है। पर सरकार है कि अपने आंकड़ों के खेल में मशगूल है। इन हालात में ब’चों का भविष्य सुधर पाएगा मुश्किल जान पड़ता है।

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