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इस फिल्म का हीरो मैं नहीं छोलियार हैं: देवा धामी

वीरता व प्रेम की कहानियां उत्तराखंड के कोने कोने में भरी पड़ी हैं। प्रदेश के कुमाऊं अंचल के प्रसिद्ध छोलिया नृृत्य की कहानी भी प्रेम और वीरता के इतिहास को अपने आप में समेटे हुए है। लेकिन ये छोलिया नृृतक समाज में उस मान सम्मान को पाने के लिए हमेशा से ही जददोजहद करते आ रहे हैं जिसके वे वारस्तव में हकदार हैं। इस बार रूपहले पर्दे पर ऐसे ऐसे ही एक छोलिया नृृतक की कहानी को लेकर आए हैं स्वयं सेवी संगठन दिया, जतिन्द्र भाटी और याशिका बिष्ट। फिल्म का निर्देशन किया है कुमाऊंनी फिल्म चेली का निर्देशन कर चुके कमल मेहता ने। कमल मेहता वहीं हैं जो सन्नी देओल स्टारर गदर -एक प्रेम कथा व हालिया रिलीज सरगोशियां के डीओपी रहे हैं। लगभग एक घंटा 35 मिनट की हिंदी में बनी यह उत्तराखंडी फिल्म अक्टूबर माह में यानी दीपावली के आसपास पर्दे पर उतरेगी। फिल्म का स्टोरी ट्रीटमेंट और तकनीक विशुद्ध रूप से मुंबइया होने का दावा किया जा रहा है। फिल्म को एक सपने के रूप में जीने वाले मुख्य कलाकार देवा धामी हमारे विशेष कार्यक्रम में पहुंचे तो तेजपाल नेगी ने उनसे बात की।
– उत्तराखंडी छोलियारों पर फिल्म बनाना रिस्की नहीं लगा आपको?
– देखिए… छोलियार हमारी संस्कृृति का एक हिस्सा हैं। उन पर कहानी कहना तो मुझे गौरवान्वित कर गया।
– आप फिल्मी बैकग्राउंड से तो नहीं हैं…फिर पूरी टीम जोड़ने में समस्याएं तो आई होंगी?
–जी हां … शुरू शुरू में समस्याएं भी आईं…फिर वो कहते हैं न मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर, रास्ते बनते गए और कारवां बढ़ता गया… आज हम अपना प्रोडक्ट लेकर जिससे भी मदद को मिलते हैं वह हमें सम्मान देता है…
– उत्तराखंडी फिल्मों की वही राम कहानी…जिन्होंनंे सपना देखा वही हीरो हीरोइन बन गए?
— हा…हा…स्टोरी मेरी है….इसको सतरंगी पर्दे पर लाने का ख्वाब मैंने देखातो पर्दे पर भी इस किरदार को मुझसे बेहतर कोई नहीं जी सकता…यह आत्म विश्वास मेरे अंदर था…दूसरे फिल्म का हीरो देवा धामी नहीं छोलियार हैं...
-उत्तराखंडी लोग फिल्म जगत में अच्छा नाम कमा रहे हैं…लेकिन मुंबई जाकर वापस मुडकर नहीं देखते…ऐसा क्यों?
— यह बात काफी हद तक सच भी है…बड़े बड़े नाम उत्तराखंड ने दिए हैं वालीवुड को लेकिन अपनी मिटटी को मुंबई जाकर लगता है सब भूल जाते हैं… वे लोग सार्वजनिक मंच पर यह कहने से भी हिचकते हैं कि वे उत्तराखंड से जुड़े हैं। चाहे प्रसून जोशी हों…या तिग्मांशू धूलिया…
– आपका सपना क्या है…..
–मेरा ख्वाब है कि मैं अपने राज्य को कुछ ऐसा दे जाऊं जिसे ेखकरलोग कहें कि उत्तरराखंड वास्तव में विलक्षण है…छोलियार भी उसी ख्वाब का एक हिस्सा है….उनका जीवन…उनका रहन सहन…उनका नृृत्य और समाज में उनका स्थान…ईश्वर करें कि दर्श फिल्म के साथ न्याय करें।
-हिंदी में पहाड़ी कहानी कहने का आइडिया कहां से आया आपके दिमाग में।
— हम फिल्म को बोली भाषा के दायरे से बाहर रखना चाहते थे, हम चाहते थे हर प्रांत के लोग इसे देखें और हमारी
संस्कति के इस अभिन्न हिस्से को सराहें...
– बहुत बहुत शुभकामनाएं आपको…अगला प्रोजेक्ट?
हां नींव डाली जा चुकी है….यानी टाइटल रजिस्टर्ड करवा लिया है…पहाड़ी-अनकामन मेन…जल्दी ही काम शुरू करेंगे इस पर….
– कहानी
दानी राम एक छोलियार हैं….घर में पत्नी है एक बेटा है….पत्नी ने जतन के साथ बेटे देव राम को पढ़ाई के लिए दिल्ली रिश्तेदारों के पास भेज दिया है…दानीराम चाहते हैं कि उनके बाद उनकी विरासत उनका बेटा संभाले…लेकिन पत्नी यह नहीं चाहती…उसका कारण है दानी राम की माली हाल व समाज में उनकी व उनके साथियों के होने वाला दोगला व्यवहार…एक दिन दानी राम का ग्रुप छोलिया नृृत्य के लिए गांव के सेठ के बेटे की शादी में जाता है यहां सेठ दानी राम को उसकी जाति व समाज में रूतबे को लेकर खूब खरी खोटी सुनाते हैं और उन्हें किसी और की शादी में भी शामिल न होने के लिए पाबंद कर देता है। यह बात दानीराम के दिल से लग जाती है और घर लौटकर वे चारपाई पकड़ लेते हैं…उधर उनका बेटा देवराम फौज में अफसर बन जाता है। पिता की मौत पर जब वह घर आता है तो उनके बक्से में रखा एक कागज का टुकड़ा पढ़ कर उसकीजिंदगी बदल जाती है…दरअसल दानीराम भले ही अनपढ़ थे…लेकिन उनका सपना था कि वे अपने छोलियार ग्रुप के माध्यम से पहाड़ की इस गौरवशाली विधा को दुनिया से रूबरू करवाएं….बेटा देवाराम आगे क्या करता है…उसके साथ क्या-क्या समस्याएं आई और अंत में वह पिता के सपने को साकार कर पाया या नहीं यह जानने के लिए आपको अगले महीने तक इंतजार करना पड़ेगा।

छोलियार के सरप्राइज
-ल्मोड़ा के सांसद अजय टम्टा इस फिल्म में मंत्री के रोल में हैं। लेकिन यह रोल उन्होंने तब किया था जब वे मंत्री नहीं बने थे।
-गायक पवन दीप राजन ने छोलियार में गीत गाए हैं। लेकिन उन्होंने यह गीत तब गाए थे जब उन्होंने रियलटी टीवी शो नहीं जाता था। इसके बाद उन्हें यह उपलब्धि हासिल हुई।
-पिल्म के गीत हेमंत बिष्ट ने लिखे हैं,लेकिन ये गीत उन्होंने तब लिखे थे जब उनका लिखा गीत उत्तराखंड का राज्य गीत नहीं बना था। यह उपलब्धि उन्हें भी बाद में ही प्राप्त हुई।

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