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बारिश के विलम्ब से पहाड़ों में रबी की फसल की बुआई रूकी

दिसम्बर प्रथम पखवाड़े से पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होने के आसार

सिंचाई सुविधा नहीं होने से पहाड़ों में 80 प्रतिशत कृषि वर्षा पर निर्भर

चन्द्रेक बिष्ष्ट, नैनीताल। उत्तरांखड में इस बार भी मौसम के तेवर की पुनरावृत्ति होने से खासतौर पर पर्वतीय क्षेत्र के काश्तकारों व बागवानों की चिन्ता बढऩे लगी है। वर्षा ऋ तु खत्म होने के बाद सितम्बर से वर्षा नहीं होने से कृषि व बागवानी प्रभावित हो सकती है। उपराऊ कृषि क्षेत्रों में अब तक रबी की फसल की बुआई की तैयारी तक नहीं हो सकी है। वर्षा के विलम्ब से कई स्थानों में पानी के स्रोतों पर भी विपरित प्रभाव पडऩे की सूचना है। जलवायु परिवर्तन पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार देर से सही बल्कि शीतकाल में भरपूर वर्षा होगी। साथ ही अच्छी बर्फबारी भी होगी। इस बार पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव भी बढ़ रहा है। मौसम चक्र के अनुसार दिसम्बर प्रथम पखवाड़े से पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने के आसार हैं। यह दो हिस्सों में उत्तराखंड में पहुंच रहा है। पश्चिमी विक्षोभ के कारण ही पिछले दिनों उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बर्फवारी हो चुकी है। बहरहाल मौसम वैज्ञानिक ने कई बार जो पूर्वानुमान दिये हंै उसके उलट ही हुए है। लिहाजा काश्तकार वर्तमान स्थितियों से काफी चिन्तित हैं।

पर्वतीय क्षेत्र में नवम्बर व दिसम्बर माह से रबी की फसल बुआई का कार्य शुरू होता है। वहीं बागवानी के तैयारी भी इन्हीं दिनों की जाती है। अच्छे उत्पादन के लिए बागानों में इन दिनों नमी के लिए वर्षा व बर्फबारी की भी जरूरत होती है। लेकिन अभी तक वर्षा ऋतु के बाद वर्षा अब तक नहीं हो पाई है। इस बार पिछले मौसम की तरह पुनरावृत्ति होने की आशंका काश्तकारों में बनी हुई है। बीते वर्ष भी बरसात के मौसम के बाद न तो वर्षा हुई और न ही पर्याप्त बर्फबारी हुई। इसका असर नैनीताल शहर में भी देखने को मिला इससे क्षेत्र की झीलों व नदियों का जल स्तर चिन्ताजनक स्थित तक गिर गया। पर्वतीय क्षेत्रों में सिंचाई सुविधा अधिक नहीं होने से यहां 80 प्रतिशत कृषि व बागवानी वर्षा पर निर्भर है। लेकिन पिछले तीन वर्षों से रूखे मौसम ने काश्तकारों की कमर ही तोड़ दी है। वर्षा ऋतु के बाद नैनीताल सहित अन्य जिलों में वर्षा तक नहीं हुई है। वर्तमान में जब रबी की फसल बोने का समय आ चुका है तो उपराऊ क्षेत्र के काश्तकार आसमान की ओर टकटकी लगाये हुए है। बीते वर्ष की तरह इस वर्ष भी मौसम के तेवर यही रहे तो किसानों को भारी नुकसान हो सकता है। पहाड़ों में कई दूरस्थ इलाकों में खेतों से ही ग्रामीण दो जून की रोटी जुटाते हैं। गढ़वाल व कुमाऊं के ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फवारी हो चुकी है। लेकिन मध्य हिमालय क्षेत्र अभी सूखा पड़ा है।

उत्तरी भारत व पर्वतीय क्षेत्र में शीतकाल में पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव से पर्याप्त वर्षा व हिमपात होगा। मौसम चक्र के हिसाब से इस बार शीतकाल में पर्वतीय क्षेत्र के ऊंचाई वाले हिस्सों में अच्छी बर्फबारी के भी संकेत है। गढ़वाल व कुमाऊं के ऊंचाई वाले इलाकों में वर्षा व बर्फवारी हो चुकी है। मध्य हिमालय क्षेत्रों में अच्छी वर्षा व बर्फवारी होने की पूरी संभावना है। इस बार खाड़ी देशों उठने वाले पश्चिमी विक्षोभ दो हिस्सों में उत्तराखंड में सक्रीय होगा। इससे इस माह के अंत तक या दिसम्बर के पहले पखवाड़े में मध्य हिमालय क्षेत्रों में बर्फवारी के साथ ही अच्छी वर्षा होगी। इस बार कड़ाके की ठंड भी पडऩे की पूरी आशंका है। वर्तमान में लम्बे चले मानसून के कारण पर्वतीय क्षेत्र में नमी बनी हुई है। जिससे कोहरा व बादलों की मौजूदगी बनी हुई है। डा. बहादुर सिंह कोटलिया, यूजीसी वैज्ञानिक नैनीताल।

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