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वैकल्पिक चिकित्सा के रूप में बढ़ रही है इलेक्ट्रो होम्योपैथी पद्धति

हानिरहित वनस्पतियों से तैयार होती है दवायें
आइरिस डाईग्नोसिस जांच की विलक्षण पद्धति
दीपक मनराल , अल्मोड़ा। ऐलोपैथिक, यूनानी, आयुर्वेदिक, होम्योपैथी के बीच इन दिनो इलेक्ट्रो होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति एक हानिरहित व कारगर चिकित्सा पद्धति के रूप में स्थापित हो चुकी है। कई प्रकार के जटिल व असाध्य रोगों के निदान में इस पद्धति के चिकित्सकों ने सफलता अर्जित की है जिससे आम नागरिकों का रुझान अब इलेक्ट्रो होम्योपैथी की तरफ बढ़ रहा है।
उल्लेखनीय है कि तमाम चिकित्सा पद्धतियों के बीच हानिरहित वनस्पतियों से तैयार दवाओं और तमाम असाध्य व सामान्य रोगों के सटीक उपचार के चलते वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के तहत इलेक्ट्रो होम्योपैथी ने अपना अलग स्थान बना लिया है। जहां एक्सरे, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्केन, एमआरआई जैसे जांच माध्यमों से मौजूदा रोग का ही पता लग सकता है, वहीं इस पद्धति में शामिल आइरिस डाईग्नोसिस से न केवल शरीर की वर्तमान बीमारियों, बल्कि भविष्य के सम्भावित रोगों का पता भी चल जाता है।
ज्ञात रहे कि इलेक्ट्रो होम्योपैथी का अविश्कार इटली में काउंट सीजर मैटी ने वर्श 1965 में किया था। आज यह चिकित्सा पद्धति संपूर्ण विश्व में अपना अलग स्थान बना चुकी है। इस पद्धति में यह माना जाता है कि स्वस्थ जीवन का सीधा संबंध केवल रक्त और रस से है। इनमें से किसी एक की अशुद्धता से शरीर में रोग उत्पन्न हो जाता है। इस चिकित्सा पद्धति में कनिका निदान यानी आइरिस डाईग्नोसिस रोग निर्धारण का मुख्य आधार है। यह रोग निदान की वह तकनीक है जिसके द्वारा रोगी की आंख में स्थित कनिका की जांच कर प्रकर चिन्हों द्वारा शरीर के अंगों में होने वाली विकृति के कारण उत्पन्न रोग एवं रोगी की प्रकृति (कोंस्टीट्यूशन) का पता चल जाता है। खास बात यह है कि इस जांच से ब्लड शूगर, हाई कैलिशट्रोल, कैंसर जैसे जटिल रोगों का प्रारम्भिक अवस्था में ही पता चल जाता है। जानने योग्य बात तो यह है कि एक्सरे, सीटी स्केन, एमआरआई आदि पद्धतियों से जांच कराने में रोग का पता केवल तब ही लगता है, जब कोई अंग रोगग्रस्त हो जाता है, जबकि आइरिस डाईग्नोसिस से अंग रोगग्रस्त होने से पूर्व ही पता चल जाता है। यह आइरिस डाईग्नोसिस इलैक्ट्रो होम्योपैथी का अभिन्न अंग है। इलेक्ट्रो होम्योपैथी अपने आप में संपूर्ण चिकित्सा पद्धति है। यह प्रकृति एवं आइरिस डाईग्नोसिस पर आधारित है। इस पैथी में कुष्ठ, दमा, ट्यूमर, रसोली, पथरी, नियोनेटल हेपेटाइटिस, स्त्रियों का बांझपन, कैंसर, आन्त्रिक कैंसर, ओविरियन सिस्ट तथा अन्य सभी साध्य व असाध्य रोगों का उपचार सम्भव है। इलेक्ट्रो होम्योपैथी की औषधि रंगहीन, गंधहीन व स्वादहीन होती है। जल के माध्यम से यह खिलाई जाती है। इसकी दवाइयां बॉडी सिस्टम में विश्वास रखती हैं। शरीर के नाड़ीतंत्र में पूर्णत: काम करती हैं। यह दुष्प्रभाव रहित चिकित्सा पद्धति है। इस पैथी से जटिल से जटिल रोगों का इलाज किया जाता है। रोग की अवस्था के अनुसार ही रोगी को दवा उपलब्ध कराई जाती है। यह दवाएं पौधों के भीतर विद्यमान तीन महाशक्तियों से तैयार की जाती है जिन्हें मरकरी, सल्फर और सालर के नाम से जाना जाता है। इसके बाद इन तीन महाशक्तियों को कोहोवेशन द्वारा एक साथ जोड़ा जाता है जिससे जो शक्ति प्राप्त होती है, उसे ओडी फोर्स के नाम से जाना जाता है। यही ओडीफोर्स पावर ऑफ मेडिसन के नाम से जानी जाती है। कुल मिलाकर इलेक्ट्रो होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति एक ऐसी कला व विज्ञान है, जो मानव के नाम पर केवल रोगों का उपचार करती है, बल्कि भविष्य में होने वाले सम्भावित रोगों से सुरक्षा हेतु मजबूत कवच प्रदान करते हुए शरीर, मस्तिष्क व आत्मा को शुद्ध कर देती है।

 

इलेक्ट्रो होम्योपैथी व होम्योपैथी में कोई समानता नहीं : डॉ. आर्या

इलेक्ट्रो होम्योपैथी चिकित्सक डॉ. बी.एल. आर्या

   अल्मोड़ा। यहां जौहरी बाजार, बांस गली स्थित पूरब इलेक्ट्रो होम्योपैथी क्लीनिक एंड आइरिस डाईग्नोसिस सेंटर के डा. बीएल आर्या के अनुसार इलेक्ट्रो होम्योपैथी और होम्योपैथी में कोई समानता नहीं है और दोनों पूरी तरह अलग-अलग चिकित्सा पद्धति हैं। उन्होंने बताया कि महात्मा काउंट सीजर मैटी ने इलेक्ट्रो होम्योपैथी तथा डॉ. सेमएल हनिमैन ने होम्योपैथी की खोज की थी। इलेक्ट्रो होम्योपैथी इटली की तथा होम्योपैथी जर्मनी की पैथी है। इलेक्ट्रो होम्योपैथी में मात्र वनस्पति वर्ग से ही औषधियां तैयार की जाती हैं, जबकि होम्योपैथी में वनस्पति वर्ग के अतिरिक्त पशुओं के विष और खनिज आदि वर्गों का भी इस्तेमाल होता है। इलेक्ट्रो होम्योपैथी चिकित्सा में शरीर के अवयवों के साथ औषधियों का संबंध एवं उचित मात्रा की वैज्ञानिक पुष्टि और सिद्धि है, जबकि होम्योपैथी में स्वस्थ अवयवों पर औषधियों की प्रतिक्रिया का वर्णन है। इन दोनों चिकित्सा पद्धतियों में तमाम अंतर हैं जिन्हें समझना जरूरी है।

 
यह भी जानिये!
अल्मोड़ा। इलेक्ट्रो होम्योपैथी की औषधियां भारत सरकार के ड्रग एंड कोस्मेटिक एक्ट 1940 के अधीन नहीं हैं। न ही इसकी औषधियंा इण्डियन सिस्टम ऑफ मेडिसन के अंतर्गत आती हैं। यह इंडियन मेडिसन सेंट्रल काउंसिल एक्ट 1970 एवं होम्यो काउंसिल एक्ट 1973 के अंतर्गत आती हैं। जिस प्रकार माडर्न मेडिसन जर्मन एवं स्विट्जरलैंड में प्रमाणित अधिकृत प्रयोगशाला में तैयार की जाती हैं, उसी प्रकार इलेक्ट्रो होम्योपैथी औषधियां स्प्रेजरिक एसेंस पौधों के भीतर विद्यमान तत्वों से तैयार होती हैं।

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