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बभूत से नहीं, डॉक्टरी इलाज से होगा ‘हिस्टीरिया’ का समाधान

अल्मोड़ा। उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में अक्सर हम समय-समय पर स्कूली छात्राओं के बेहोश होने की खबरें देखते व पढ़ते आये हैं। गढ़वाल तथा सल्ट, चौखुटिया आदि स्थानों पर ऐसे मामले अधिक आये हैं। कई लोगों ने यह कह दिया की इनको आंछरिया लग गयी हैं तो किसी ने परी का शरीर में प्रवेश, लेकिन यह न तो आंछरियों के कारण होता है और न ही बभूत लगने से ठीक होता है। स्कूल में यकायक गश खाकर गिरने, चिल्लाने वाली छात्राओं के इस लक्षण को हम ‘हिस्टीरिया’  के नाम से जानते हंैं। हिस्टीरिया अवचेतन अभिप्रेरणा का परिणाम है। अवचेतन अंतद्र्वंद से चिंता उत्पन्न होती है और यह चिंता विभिन्न शारीरिक, शरीर क्रिया संबंधी एवं मनोविज्ञानिक लक्षणों में परिवतर्तित हो जाती है। इस रोग के लक्षण में यह बाह्य लक्षण के रूप में सामने आ जाती है। तनाव से छुटकारा पाने का हिस्टीरिया एक साधन हो सकता है। हिस्टीरिया भावात्मक रूप से परिपक्व एवं संवेदनशील, प्रारंभिक बाल्यकाल से किसी भी आयु के बच्चों, पुरुषों व महिलाओं में पाया जाता है। दुर्लातित एवं आवश्यकता से अधिक संरक्षित बच्चे इसके अच्छे शिकार होते हैं। किसी दु:खद घटना एवं तनाव के कारण इसमें दौरे पड़ते हैं।
लक्षण- इस रोग के लक्षण काफी बड़े हैं एक या एक से अधिक अंगों के पक्षाघात के साथ बहुधाा पूर्ण संवेदनक्षीणता जिसमें सुई अथवा चाकू से चुभने की अनुभूति न हो, हो सकती है। अन्य लक्षणों में शरीर में ऐंठन या हिस्टीरिकल फिट या शरीर के किसी अंग में थरथराहट, ऐंठन, बोलने में परेशानी, निगलने तथा श्वास लेते समय दम घुटना, गले या अमाशय में ‘गोला’ बनना, बहरापन, हंसने या चिल्लाने का दौरा आदि है। रोग के लक्षण एकाएका प्रकट या लुप्त हो सकते हैं। पर कभी-कभी लगातार सप्ताह अथवा महीनों तक इसके दौरे बने रह सकते हैं। युद्व काल में ऐसे रोगी भी पाये गए जो कुछ समय के लिए अथवा जीवनपर्यंत अपने को भूल गए हैं।
इसके उपचार के लिए संवेदनात्मक व्यवहार, पारिवारिक समायोजन, शामक औशधियों का सेवन, सांत्वना, बहलाने से किया जाता है। पक्षाघात हुए अंगों को उपचार हेतु शामक औशधियों तथा विद्युत उद्ीपनों की भी सहायता ली जाती है।
मास हिस्टीरिया- मास हिस्टीरिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें सामूहिक रूप से लोग एक ही तरह के वहम के शिकार हो जाते हैं। अपुश्ट सूचनाएं अफवाह या फिर बढ़ा चढ़ाकर पेश करने से आसपास का माहौल इसकी चपेट में आ जाता है। लोग अफवाहों की चपट में आकर एक्यूट साइकोसिस (मोनिया) की जद में आ जाते हैं। और इसके शिकार हो जाते हैं। एक्यूट साइकोसिस से पीडि़त व्यक्ति के दिमाग में डोपामीन हारमोन्स की मात्रा सामान्य से काफी बढ़ जाती है जिससे उसकी सोच, व्यवहार, बोलचाल आदि का संतुलन बिगड़ जाता है। पीडि़त इसमें सामान्य से अधिक गतिविधियां करने लगता है, उसकी जुबांन अधिक चलने लगती है, उसका संतुलन बिगडऩे लगता है। अगर किसी परिवार में किसी सदस्य को पहली बार एक्यूट साइकोसिस होता है तो परिवार के अन्य सदस्यों में मास हिस्टीरिया होने की आशंका अधिक हो जाती है। यह समस्या आसपास के वातावरण में फैल जाती है, लेकिन ऐसे मामलों में पीडि़त व अन्य सदस्यों का कुछ ही समय के लिए संतुलन बिगड़ता है, जिसमें इलाज से हारमोन सामान्य होने पर सब कुछ सामान्य हो जाता है। मास हिस्टीरिया की उन जगहों पर होने की आशंका अधिक रहती है। जहां परिवार या समाज में भावात्मक तौर पर एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इसमें पीडि़त को देखकर परिवार या अन्य आस-पास के सदस्य खुद को उसी में ढालने की कोशिश करते हैं इन मामलों में पीडि़त को तुरंत इलाज या काउंसिलिंग न लेने पर उसकी हालत बिगड़ सकती है। अधिकांश मामलों में ग्रामीण मामलों में ग्रामीण क्षेत्रों के लोग इलाज के बजाए झाड-फूंक पर अधिक विश्वास कर लेते हैं। इससे मरीज की हालत तो खराब हो ही जाती है साथ ही परिवेश में अंधता व्याप्त होने लगती है। ऐसे मामले यदि प्रकाश में आते हैं तो इसके लिए पीडि़त को तुरंत इलाज की जरुरत होती है। परिवार के सदस्यों में ऐसे लक्षण मिलने पर उन्हें पीडि़त से अलग रखना चाहिए और पीडि़त को अस्पताल डॉक्टर के पास ले जाने की आवश्यकता है।
-गुंजन देवलाल, शोध छात्रा (मनोविज्ञान)
सोबन सिंह जीना परिसर, अल्मोड़ा

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