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शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में शामिल है जागेश्वर

अल्मोड़ा। कत्यूरी शासनकाल में निर्मित शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में शामिल जागेश्वर म्ांदिर समूह सदियों से शिव भक्तों और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहा है। देवदार के घने विशाल वृक्षाें से घिरे इस सुरम्य स्थल पर पहुंचकर एक अद्भुत आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है। मान्यता है कि नेपाल में जो महत्व पशुपतिनाथ का है वहीं यहां जागेश्वर का है।
जिला मुख्यालय से 36 किमी की दूरी पर पूर्वोत्तर दिशा में घने देवदार के वनों से घिरा जागेश्वर मंदिर समूह यहां आने वाले लोगों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। यहां 124 छोटे-बड़े म्ांदिर समूह हैं, जो लगभग 8 वीं शताब्दी से 15 वीं शताब्दी के मध्य निर्मित हुए थे। हालांकि लिखित ऐतिहासिक दस्तावेजों के अभाव में इनके निर्माण का कालक्रम ज्ञात नहीं हो पाया है, लेकिन इसके जीर्णोद्धार के प्रमाण अवश्य मिलते हैं। कहा जाता है कि इनके जीर्णोद्धार का काम राजा शालिवाहन ने करवाया था। महामृत्युंजय म्ांदिर का शिलालेख मल्ल राजाओं ने अंकित किया था, जब वे पशुपतिनाथ (नेपाल) होते हुए यहां जागश्ेवर आए थे। यहां स्थित म्ांदिरों में से लगभग आधा दर्जन भर म्ांदिरों में ही विधिवत पूजा-अर्चना होती है। जिनमें महामृत्युंजय, जागनाथ, बागनाथ, पुष्टि माता, भैरव म्ांदिर आदि शामिल हैं। इनमें महामृत्युंजय म्ांदिर सबसे प्राचीन है। इसका निर्माण आठवीं सदी यानी पूर्व कत्यूरी काल में हुआ था। इसका जीर्णोद्धार महाराज विक्रमादित्य ने किया था और उसके बाद आदि जगतगुरफ़ शंकराचार्य ने इस शक्ति को प्रतिष्ठित किया। उनके द्वारा नियुक्त भट्ट ब्राह्मणों के परिवार आज भी म्ांदिर के पुजारी हैं। यहां मुख्य शिव लिंग लगभग 10 फीट भूमि के नीचे तक है। इसके ऊपरी भाग में एक नेत्र बना हुआ है। मान्यता है कि इस लिंग के समक्ष की जाने वाली हर फरियाद सुनी जाती है। इतिहासकारों के मुताबिक सन् 1740 में अली मुहम्मद खां ने अपनी रूहेला सैनिकों के साथ कुमाऊं में लूटमार के इरादे से आक्रमण किया था। उसने अल्मोड़ा नगर के अनेकों म्ांदिरों को नष्ट करके मूर्तियों को तोड़ दिया था, लेकिन उसका जागेश्वर आक्रमण सफल नहीं हो पाया। यहां की सर्दियों और कुमाऊंनी वीरों के संघर्ष के चलते उसके बहुत से रफ़हेल सैनिक मारे गये और अली मुहम्मद को वापस लौटने को विवश होना पड़ा। यहां के अद्भुत वास्तु और मूर्ति शिल्प से प्रभावित होकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने 20 सितंबर 2002 को एक संग्रहालय की स्थापना की थी। इस संग्रहालय में तीन दर्जन से अधिक ऐतिहासिक मूर्तियों को पर्यटकों के लिए रखा गया है। यहां से महज दो किमी की दूरी पर ऐतिहासिक वृद्ध जागेश्वर और डंडेश्वर म्ांदिर समूह भी विद्यमान है। डंडेश्वर को जागेश्वर ज्योतिर्लिंगों का प्रवेश द्वार माना जाता है।

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