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कार्यक्रम में मौजूद फांउडेशन के लोग।

रामनगर : जीवन बचाने को ‘पानी की आवाज सुनो’

रामनगर। उत्तराखंड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान केंद्र व पवलगढ़ प्रकृति प्रहरी के तत्वावधान में नौला फाउंडेशन संयुक्त प्रयास से जल संरक्षण कार्यशाला आयोजित की गयी। जल की महत्ता को देखते हुए जन जागरूकता की कार्यशाला ‘पानी की आवाज सुनो 2030’ का आयोजन किया गया। जिसमें देश से आये वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने अपनी बात रखी। नौला फाउंडेशन के स्वामी वीत तमसो ने बताया कि पर्यावरण संरक्षण से संबंधित सारी चर्चाएं महज लेखों, बातों और सोशल मीडिया तक ही सीमित रह गई हैं। धरती पर अब 22 फीसदी वन क्षेत्र ही बचा है, जो अपने आप में एक खतरे की घंटी है। पर्यावरण असंतुलन को रोकने के भागीरथी प्रयास होते रहे हैं, किंतु स्थिति जस-की-तस है। विकास जरूरी तो है, पर ध्यान रहे कि प्राकृतिक संकेतों को तिलांजलि देते हुए अंधाधुंध विकास, विनाश के जनन को उत्तरदायी होता है। यूसर्क के निदेशक वैज्ञानिक प्रोफेसर दुर्गेश पंत के अनुसार जैव विविधता के मामले में आदिकाल से धनी रहे भारत जैसे देश के अधिकांश शहर आज प्रदूषण की भारी चपेट में है। पर्यावरणीय संकेतों तथा विकास के सतत पोषणीय स्वरूप की अवहेलना कर अनियंत्रित आर्थिक विकास की आंच हिमालय तक आ चुकी है। हिमालय से निकली नदियों का पूरे देश से सीधा सम्बन्ध है, जिनका हरित और श्वेत क्रान्ति में महती भूमिका है। पर्यावरण में चमत्कारिक रूप से विद्यमान तथा जीवन प्रदान करने वाली नदियां आज प्रदूषित होकर मानव जीवन के लिये खतरनाक और कुछ हद तक जानलेवा हो गई है। पवलगढ़ प्रहरी के संस्थापक पर्यावरणविद् मनोहर मनराल ने बताया कि अभी देश में चुनाव चल रहे है परंतु किसी ने पर्यावरण जैसे संवेदनशील मुद्दे को गम्भीरता से नहीं लिया। सदानीरा कोसी, गौला, दाबका नदियों के साथ-साथ कई गधेरों जो रामनगर, हल्द्वानी के अलावा पूरे भाबर और तराई क्षेत्र की जीवनरेखा का काम करती है। आज उसका पानी सूखने की कगार पर है, यदि एक बार नदियां सूखने लगती हैं तो मानव अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। जिसका परिणाम गर्मियों में भयंकर पानी की कमी का खतरा मंडरा रहा है। हम पानी की आपूर्ति के लिए कहां जाएंगे? वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. गिरीश नेगी ने बताया आज धरती का तापमान बढऩे से जलवायु परिवर्तन की जो स्थितियां बनी हैं। उनके कारण उत्तराखण्ड जैसे क्षेत्र में नौले-धारे सूख रहे हैं या सूख चुके हैं। इसके लिये हम सब जिम्मेदार हैं। पानी की उपलब्धता कम होने के कारण आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संकट भी सामने आ रहे हैं। समाज में हिंसा बढ़ रही है, समाज बिखर रहा है। पर्यावरणविद् किशन भट्ट कहना है की राज्य सरकार और स्थानीय सामाजिक संस्थाओं के साथ-साथ स्थानीय जन भागीदारी को भी आगे आकर हिमालय के सूख रहे पारम्परिक जल स्रोत नौले, धारे, गाड़-गधेरों के साथ वहां की जैव विविधता को भी बचाना होगा। अब ऐसे संतुलित कानून बनाने होंगे। नौला फाउंडेशन के राष्टï्रीय अध्यक्ष बिशन सिंह ने बताया कि नौला फाउंडेशन का उत्तराखंड की पारम्परिक जल स्रोत और सांस्कृतिक प्रतीक नौलों, धारों को संरक्षित करना ही एकमात्र मिशन हैं। भूमि, जल, वनस्पति और पशुओं जैसी जीवन को सहारा देने वाली बुनियादी व्यवस्थाओं के संरक्षण में उत्तराखंड की महिलाओं ने अहम भूमिका निभाई है और निभा रही हैं। डॉ भारद्वाज ने बताया परिवार में सिंचित अथवा वर्षा-सिंचित पानी इक_ा करने, इस्तेमाल करने और उसके प्रबंधन में उनकी महत्वपूर्ण सहभागिता के कारण महिलाएं जल संसाधनों की कड़ी हैं। उनके पास जल-संसाधनों की गुणवत्ता एवं विश्वसनीयता, सीमा एवं भंडारण के उचित तरीकों समेत पीढिय़ों से मिला ज्ञान है। जलवायु परिवर्तन के कारण 50 प्रतिशत से ज्यादा जल धाराएं सूख चुकी हैं, और जो बची है उनमें भी सीमित जल ही बचा है। स्थानीय जन भागीदारी में महिलाओं को भी अब आगे आना होगा और हिमालय के सूख रहे पारम्परिक जल स्रोत नौले, धारे, गधेरों, गाड़ के साथ वहां की जैव विविधता को भी बचाना होगा। सरकार को भी हिमालय के लिए एक ठोस नीति बनानी होगी। कार्यक्रम में वन विभाग के आला अफसरों के अलावा यूसर्क के निदेशक डा. दुर्गेश पंत, पर्यावरणविद् डा. रीमा पंत, मनोहर मनराल, डा. नवीन जोशी, पर्यावरणविद् स्वामी वीत तमसो, डा. एके भारद्वाज, डा. गिरीश नेगी, भूपिंदर मनराल, बिशन सिंह, सुशीला सिंह, ब्रिगे. धीरेश जोशी, गजेंद्र पाठक, संदीप मनराल, सुमित बनेशी, महेंद्र बनेशी, गगन प्रकाश, खीम सिंह, गौरव पंत, गोपाल सिंह, पुष्कर सिंह नेगी ने भी अपने विचार रखे।

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