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काली कुमाऊं की खड़ी होली का पूरे उत्तर भारत में बजता है डंका, चंद राजा व अंग्रेज भी थे मुरीद

मनोज कुमार राय, चंपावत। फागुन का महीना आते ही हवा में अजब सी मीठी महक घुलने लगती है। फिजाओं में होली के रंग छाने लगे हैं। मानो प्रकृति भी इसम मौसम का आनंद लेना चाहती हो। बाजार तैयार हैं और होल्यार महफिल सजाने लगे हैं।
यू ंतो कुमाऊं भर में होली धूमधाम से मनाई जाती है लेकिन चंपावत की होली का अपना ही अलग अंदाज है। काली कुमाऊं के नाम से प्रसिद्ध चंपावत जिले की खड़ी होली पूरे उत्तराखंड में प्रसिद्ध है। जानकार बताते हैं कि चंद राजाओं सहित अंग्रेज भी कुमाउनी होली के मुरीद थे। इसका गवाह जिला मुख्यालय से लगभग 23 किमी दूर स्थित एबट माउंट है जिसकी खूबसूरती व हिमालय दर्शन अंग्रेजों को लोहाघाट तक खींच लाया। वहां बसे अंग्रेज हर साल आसपास के बसे गांवों में होली खेलने जाया करते थे। बुजुर्ग बताते हैं कि अंग्रेजी मैमों को कुमाउनी महिलाओं के परिधान घाघरा-चोली व धोती काफी पसंद थी। होली खेलने के लिए वह भी धोती आदि पहनती थीं। सर एबट ने 1910 में यहां लीज पर 582 एकड़ जमीन खरीदी थी। बताते हैं कि एबट व उसकी पत्नी भी कुमाउनी होली के काफी शौकीन थे। बाद में अंग्रेज व्यापारी जॉन हारोल्ड सहित कई अंग्रेज बाराकोट, बापरू, रेगडू, लोहाघाट आदि गांवों की होली में शिरकत करने आया करते थे। वहीं, चंपावत के चाराल क्षेत्र से लगे छीड़ापानी में बसे अंग्रेज भी खड़ी होली में स्थानीय लोगों के साथ बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे, परंतु अब होली का स्वरूप बदलने लगा है। युवाओं में नशे की प्रवृत्ति ने होली के रंग में भंग डालना शुरू कर दिया है। होली के पुराने स्वरूप को लेकर उत्तरांचल दीप ने कुछ ऐसे बुजुर्ग होल्यारों से वार्ता की जो आज भी अपने दिनों को याद कर रोमांचित हो उठते हैं।


वक्त के साथ बदली परंपराएं

लोहाघाट। क्षेत्र के प्रसिद्ध रंग कर्मी व होल्यार भैरव दत्त राय कहते हैं कि आज होली मनाने के तौर-तरीकों में पहले के मुकाबले काफी बदलाव आया है। पहले गांव के युवा होली में बढ़-चढ़ कर भागीदारी करते थे, परंतु समय बदलने के साथ ही परंपराएं बदलने लगी हैं। नौजवान अपनी संस्कृति छोड़कर पाश्चात्य संस्कृति की ओर खिंचे चले जा रहे हैं। इतिहास गवाह है कि अपनी संस्कृति व धरोहर को बचाने में युवाओं का सबसे अधिक हाथ रहा है।

 

एक माह पूर्व तैयारियां हो जाती थी शुरू
लोहाघाट। प्रसिद्ध होल्यार किशना नंद अपने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि ग्रामीण एक माह पूर्व से होली गायन की तैयारियों में जुट जाते थे। इसमें ढोलों की साज-सज्जा व उनको ठीक कराया जाता था। आज युवा पीढ़ी को मोबाइल आदि से फुरसत ही नहीं है। जहां अन्य देश पाश्चात्स संस्कृति को छोड़कर भारतीय संस्कृति अपना रहे हैं, वहीं देश का युवा पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रंगा नजर आ रहा है।
बदलते दौर की होली लगती है बेरंग सी
लोहाघाट। होल्यार प्रहलाद सिंह बताते हैं कि एकादशी के दिन रंग पडऩे के बाद से टीके की होली तक होल्यार सांस तक नहीं लेते थे। 80 वर्षीय खूनाबोरा निवासी बुजुर्ग बताते हैं कि वह होली गायन के लिए अपने मामा के घर रेगडू जाया करते थे और पूरी होली भर वहीं रहते थे। लोग होली गायन में इतने मस्त हो जाते थे कि न उन्हें खाने की फि क्र रहती थी ना ही अपने कामकाज की। रात दिन होली के मतवाले होली गायन में मस्त रहा करते थे। यह सिलसिला टीके की होली तक चलता था। बदलते दौर की होली बेरंग सी लगती है। आज समय बदल गया है, भाग-दौड़ भरी जिंदगी में लोगों के पास एक मिनट का समय नहीं है।
धूमिल पढ़ती जा रही विरासत
लोहाघाट। होली एक ऐसा त्योहार है जिसे बच्चे, बूढ़े व जवान हर्षोल्लास के साथ मनाते हंै। परंतु आज समाज में फैल रही नशे की लत हमारी संस्कृति को खोखला करती जा रही है। काली कुमाऊं की प्रसिद्ध खड़ी होली का लोहा अंग्रेज भी मानते थे, परंतु बदलते दौर के साथ होली गायन की हमारी विरासत धूमिल पड़ती जा रही है।
रंग महोत्सव कुमाउनी होली के संरक्षण में जोड़ रहा नए आयाम
लोहाघाट। यहां श्री रामसेवा सांस्कृतिक समिति द्वारा वर्ष 2013 से आयोजित रंग महोत्सव कुमाउनी होली के संरक्षण में नए आयाम जोड़ रहा है। इसमें विभिन्न गांवों की होलियों की प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है जिसमें महिलाएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कुमाउनी होली के संरक्षण का बीड़ा रंग महोत्सव के अध्यक्ष जीवन सिंह मेहता, प्रकाश चन्द्र राय, भूपाल सिंह मेहता, पीएस मेहता, भैरव दत्त राय, किरन पुनेठा, नरेश चन्द्र राय, आनंद पुजारी, मुकेश साह आदि ने उठाया है।

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