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‘सीओपीडी’ मौतों का तीसरा बड़ा कारण

‘क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी रोगों’ के बारे में दी जानकारी
मैक्स अस्पताल ने आयोजित किया जागरुकता कार्यक्रम
21 नवम्बर 2018 को है विश्व सीओपीडी दिवस

भारत को राष्ट्रीय सीओपीडी रोकथाम एवं नियन्त्रण प्रोग्राम की जरूरत है: डॉ वैभव चाचरा
सीओपीडी भारत में अज्ञात महामारी-डॉ श्रद्धा सोनी।
देहरादून। मैक्स हाॅस्पिटल देहरादून की ओर से क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी/फेफड़ों की बीमारी) के बारे में जागरुकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौके पर अस्पताल के विशेषज्ञ चिकित्सकों (पल्मोनोजिस्ट्स) ने पत्रकारों से बातचीत में फेफड़ों की बीमारियों के बारे में विभिन्न तथ्यों और मिथकों पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सीओपीडी सांस की बीमारी है, यह तब होती है जब सांस के साथ विषैले, घातककण, धुंआ और प्रदूषण के कण हमारे फेफड़ों में चले जाते हैं।
मैक्स हॉस्पिटल, देहरादून के कन्सलटेन्ट एवं हेड पल्मोनोलोजी डॉक्टर वैभव चाचरा ने कहा कि बहुत से लोगों को लगता है कि सांस की बीमारी या खांसी जैसी समस्या का कारण उम्र बढ़ना है। बीमारी की शुरूआती अवस्था में लक्षणों की तरफ हमारा ध्यान नहीं जाता। सीओपीडी के लक्षण प्रकट होने में अक्सर सालों लग जाते हैं। व्यक्ति को बीमारी तब महसूस होती है, जब यह एडवान्स्ड अवस्था में पहुंच चुकी होती है। उन्होंने कहा कि सीओपीडी अक्सर 40 साल से अधिक उम्र में होता है, यह बीमारी अक्सर उन लोगों में होती है, जिनमें धूम्रपान का इतिहास हो। उन लोगों में भी सीओपीडी की संभावना अधिक होती है जो लम्बे समय तक रसायनों, धूल, धुंआ या खाना पकाने वाले ईंधन के संपर्क में रहते हैं। भारत में पहाड़ी इलाकों की महिलाएं चारकोल या लकड़ी जलाकर खाना पकाती हैं, ऐसे में वे लम्बे समय तक धुएं के संपर्क में रहती हैं। सीओपीडी के मरीज मौसम बदलने पर बीमार पड़ जाते हैं। ठंडे मौसम का इन पर बुरा असर पड़ता है। उन्होंने बताया कि सीओपीडी का कोई इलाज नहीं है, लेकिन दवाओं के द्वारा फेफड़ों को ज्यादा नुकसान पहुंचने से बचाया जा सकता है।
डॉक्टर श्रद्धा सोनी, अटेंडिंग कन्सलटेन्ट, डिपार्टमेन्ट ऑफ पल्मोनोलोजी ने कहा कि अगर आपके आसपास कोई धूम्रपान करता है तो आप भी सीओपीडी का शिकार हो सकते हैं। इस बीमारी में फेफड़ों को नुकसान पहुंचता है, उनका विकास ठीक से नहीं हो पाता, फेफड़ों में सूजन आ जाती है। इन सब के चलते फेफड़े अपना काम ठीक समे नहीं कर पाते, जिससे ऑक्सीजन लेने और कार्बन डाईऑक्साईड छोड़ने की क्षमता कम हो जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि शहरों में बढ़ता प्रदूषण दिल और फेफड़ों के लिए घातक है। वायु प्रदूषण का बुरा असर फेफड़ों पर पड़ता है। यह सीओपीडी के मरीजों के लिए और भी घातक है। सीओपीडी मंे बचने के लिए किसी भी तरह का धूम्रपान न करें, तंबाकू, जलती लकड़ी, ईंधन, निष्क्रिय धूम्रपान समे बचें। फलों और सब्जियों से भरपूर सेहतमंद आहार लें। इस अवसर पर डॉक्टर राहुल प्रसाद मेडिकल सुप्रीटेंडेंट भी मौजूद रहे

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