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मैक्स अस्पताल अब दून में ही देगा केटीपी की सेवाएं

देहरादून में किया गया अपनी तरह का पहला सफ़ल किडनी ट्रांसप्लान्ट
किडनी के मरीजों को नहीं जाना होगा राज्य से बाहर
अनुभवी डाॅक्टरों की टीम ने संभाला मोर्चा
देहरादून। उत्तराखंड में किडनी के मरीजों को अब किडनी ट्रांसप्लांट (केटीपी) के लिए दिल्ली या राज्य से बाहर अन्य बड़े शहरों में नहीं जाना पड़ेगा। राजधानी के मैक्स सुपर स्पेशलटी अस्पताल ने यह उच्च स्तरीय सेवाएं दून में ही मुहैया करा दी है। देहरादून में हाल ही में अपनी तरह के पहले सफल किडनी ट्रांसप्लान्ट के साथ मैक्स अस्पताल देहरादून ने अब किडनी ट्रांसप्लांट (केटीपी) सेवाओं की शुरुआत कर दी है। अस्पताल में हाई हाईजनिक सेवा व सुविधाओं के साथ अनुभवी व विशेषज्ञ डाॅक्टरों की टीम केटीपी सुविधा के लिए तत्पर रहेगी।

पत्रकार वार्ता को संबोधित करते मैक्स अस्पताल देहरादून के वीपी आॅपरेशन्स एवं यूनिट हेड डा संदीप तंवर

दून के मैक्स अस्पताल में हुए सफल किडनी ट्रांसप्लांट का 56 वर्षीय मरीज़ पिछले 3 महीनों से हीमोडायलिसिस पर था। किडनी ट्रांसप्लान्ट करने वाले अनुभवी डाॅक्टरों की टीम में नेफ्रोलोजिस्ट (ट्रांसप्लान्ट फिज़िशियन), डाॅ. पुनीत अरोड़ा, एचओडी- नेफ्रोलोजी एवं यूरोलोजिस्ट (ट्रांसप्लान्ट सर्जन), डाॅ वाहिद ज़मान, सीनियर कन्सलटेन्ट, यूरोलोजी एण्ड रीनल ट्रांसप्लान्टेशन, डाॅ (कर्नल) दरेश डोडामनी, सीनियर कन्सलटेन्ट एवं एचओडी यूरोलोजी शामिल रहे। केटीपी सुविधा के शुरु होने पर आयोजित आयोजित पत्रकार वार्ता में डाॅ पुनीत अरोड़ा ने बताया कि मरीज़ को मधुमेह के कारण किडनी रोग हो गया था और पिछले तीन महीनों से वह हीमोडायलिसिस पर था। डीकडी को अलावा उसे इश्केमिक हार्ट डीज़ीज़ भी थी, जिसके कारण हमारे लिए उसका इलाज करना और भी चुनौतीपूर्ण था। मरीज़ एवं डोनर (मरीज़ की पत्नी) की अच्छी तरह जांच एवं काउन्सलिंग के बाद ट्रांसप्लान्ट का फैसला लिया गया। सर्जरी 6 घंटे तक चली और पूरी तरह से सफल रही। डोनर और मरीज़ दोनों को सर्जरी के 10 दिनों केे अंदर छुट्टी दे दी गई।

उन्होंने बताया कि 10 फीसदी व्यस्क आबादी क्रोनिक किडनी रोगों (सीकेडी) से पीड़ित है, जिसके कई कारण हैं जैसे डायबिटीज़/ मधुमेह, उच्चरक्तचाप, पथरी और कुछ आनुवंशिक बीमारियां आदि। आमतौर पर यह समस्या धीरे-धीरे बढ़ती जाती है और एक स्थिति ऐसी आती है जब मरीज़ अंतिम अवस्था के किडनी रोग (एंड स्टेड रीनल डीज़ीज़) पर पहुंच जाता है। इन मरीज़ों को जीवित रहने और गुणवत्तापूर्ण जीवन जीने के लिए आरआरटी (रीनल रिप्लेसमेन्ट थेरेपी) की आवश्यकता होती है। आरआरटी में रीनल ट्रांसप्लान्ट (सबसे अच्छा विकल्प), हीमोडायलिसिस और पेरिटोनियल डायलिसिस (सीएपीडी) शामिल है। मधुमेह एवं उच्च रक्तचाप के बढ़ते मामलों के कारण देश में हर साल ईएसआरडी के 2.5 लाख नए मरीज़ सामने आते हैं लेकिन इनमें से 1 फीसदी से भी कम मामलों (10,000 मामलों) में ट्रांसप्लान्ट हो पाता है। इसका मुख्य कारण है देश में जागरुकता तथा उचित ट्रांसप्लान्ट सुविधाओं की कमी।

मैक्स अस्पताल के वाइस प्रेजीडेंट आॅपरेशन्स एवं यूनिट हेड डा संदीप तंवर ने कहा कि पहले इस क्षेत्र में मरीज़ों को किडनी ट्रांसप्लान्ट के लिए बड़े शहरों में जाना पड़ता था, उन्हें घर से बाहर रहकर अपन इलाज कराना होता था, जिसके कारण ट्रांसप्लान्ट का खर्च और भी बढ़ जाता था। उत्तराखण्ड में सैकंड़ों मरीज़ इस बात की इंतज़ार में हैं कि केटीपी सेवाएं उनके अपने राज्य में शुरू हो जाएं। ऐसे में मैक्स अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लान्ट की शुरूआत के साथ उन्हें अब इलाज के लिए बड़े शहरों का रुख नहीं करना पड़ेगा।
डाॅ दरेश डोडामनी ने कहा कि देश में किडनी दान को लेकर गलत अवधारणाएं फैली हैं। हमें समझना चाहिए कि किडनी दान करने से डोनर के जीवन की गुणवत्ता या उम्र या शारीरिक क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसके अलावा किडनी डोनर के साथ मैच करना बहुत महत्वपूर्ण होता है। सबसे अच्छा मैच ट्विन का मिल सकता है जो कि बहुत कम मामलों में पाया जाता है। इसके बाद अक्सर माता, पिता, भाई या बहन के साथ किडनी मैच होने की संभावना सबसे ज़्यादा होती है।

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