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रंगमंच पर अभिनय करते कलाकार

रामनगर:नाटक ‘हानूस’ ने दर्शकों को किया आत्मविभोर

रामनगर। नगर में रंगमंच की परम्परा को पुनसर््थापित करने की कोशिशों में जुटी स्थानीय रंगकर्मियों की टोली ‘भोर सोसाइटी’ की नई पेशकश भीष्म साहनी के नाटक ‘हानूस’ को दर्शकों ने हाथो-हाथ लेते हुये रंगकर्मियों के सधे हुये अभिनय की जमकर प्रशंसा की। संजय रिखाड़ी के निर्देशन में हानूस का नाटय मंचन कोसी घाट के बालाजी मन्दिर के निकट ‘संनृत्यम’ में किया जा रहा है। करीब चालीस मिनट के इस नाटक का शो प्रतिदिन सांय सात बजे से किया जा रहा है, जो कि 31 जुलाई तक बदस्तूर चलेगा। नाटक के कसे हुये कथानक व रंगकर्मियो के अभिनय की अमिट छाप के कारण यह नाटक नगरवासियों की जमकर प्रशंसा बटोर रहा है। चेकस्लोवाकिया के प्राग शहर की लोक कथा पर आधारित इस नाटक का पात्र हानूस ताले बनाने का कारीगर है, लेकिन उसकी जि़द्द ऐसी घड़ी बनाने की है जिसे शहर के मुख्य स्थान पर लगाया जा सके। प्यार करने वाली पत्नी कात्या और छोटी से मासूम बच्ची के साथ तंगहाली में दिन गुजारने वाला हानूस अपनी आर्थिक दशा सुधारने के लिए कभी अर्थ का केंद्र बने चर्च की ओर तो कभी शहर की नगर पालिका की ओर उम्मीद लगाता है, लेकिन यहां उसे नाउम्मीद होना पड़ता है। घड़ी बनाने का सपना लिए हानूस दिन-रात घड़ी बनाने में जुटा रहता है और घर की बाकी जरूरियात पूरी करने की जि़म्मेदारी उसकी बीवी कात्या बखूबी निभाती रहती है। 17 साल की मुसलसल मेहनत के बाद हानूस अपने सपनों की घड़ी बनाने में सफल होता है। शहर की मुक्कदस माकूल जगह पर उसे लगाये जाने के बाद उसका उद्घाटन शहर की महारानी साहिबा का हाथों होता है। भावपूर्ण दृश्य के बीच महारानी हानूस को सोने की अशर्फियाँ और उसे अपने राजदरबारी का दर्जा देती हैं, लेकिन जैसे ही महारानी को इस बात का इल्म होता है कि हानूस 3 साल में इससे भी बेहतर और उसके अगले साल में उससे भी बेहतर घड़ी बनाकर शहर की इज़्ज़त का सबब बनी इस घड़ी का महत्व कम कर सकता है तो महारानी हानूस की दोनो आँखे निकलवाने का आदेश देकर उसे अंधे आदमी की जि़न्दगी जीने को अभिशप्त कर देती है। अपने हुनर के बदले आँखे गंवाने वाले हानूस की जि़न्दगी में अंधेरा तो हो गया लेकिन उन बे-रोशन आंखों में भी वह घड़ी को देखता रहता है। अपने अंधेपन की वजह वह अपनी उस घड़ी को मानता है। कुछ वक़्त बदलता है तो एक दिन फिर सरकारी कारिंदे हानूस के घर आ धमकते हैं, इस बार वजह हानूस की बनायी घड़ी का खराब हो जाना थी, जिसकी मरम्मत के लिए हानूस को महारानी की तरफ से हुक़्म हुआ था। हानूस घड़ी की मरम्मत के लिए चला तो जाता है लेकिन इस बार उसका इरादा रचनात्मक न होकर विध्वंसात्मक था। बदले की आग लिए हानूस घड़ी को नेस्तनाबूत करके महारानी से अपनी आंखों का बदला लेना चाहता है। लेकिन अंधा हानूस जैसे ही अपनी रचना घड़ी का स्पर्श करता है उसे वही अनुभूति होती है जो प्रसव पीड़ा के बाद माँ को अपने नवजात के छूने से होती है। आँखे निकाल लिए जाने के बाद भी हानूस अपना बदला घड़ी से लेने का साहस नहीं जुटा पाता। किसी अबोध बच्चे की मानिंद अपनी घड़ी से खेलता हानूस उसकी मरम्मत करके उसे सुधार देता है। इसके साथ ही वह उम्मीद करता है की उसकी वह घड़ी रहती दुनिया तक अनवरत चलती रहे, वावजूद इसके की उसकी वजह से उसकी आंखों की रोशनी चली गई। मर्मस्पर्शी नाटक के अंतिम दृश्य में रचनाकार के प्रतीक बने हानूस का सत्ता और शक्ति का केंद्र बनी महारानी को दिया संदेश ‘ज्ञान और विज्ञान वनवे ट्रैफिक की तरह होता है, जहां पहुंच जाता है वहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं होता ! हाँ, आगे बढऩे की संभावनाएं अनंत होती हैं….’ दर्शको नाटक के समाप्त होते-होते बखूबी समझ आ रहा है। हानूस की भूमिका में अमित तिवारी, कात्या की भूमिका में अंकिता परिहार, यांका बनी हिमानी थापा, छोटी यांका मानसी थापा, नगर पालिका अधिकारी बने दीपक थापा व मीनू थापा, जेकब बने निशाद खान, महारानी की भूमिका में कनिका ध्यानी ने अपने सधे हुये अभिनय के बल पर दर्शको को भावविभोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ीं वहीं रंगमंच के पीछे से मानसी रावत, अनिल, तान्या निषाद ने ध्वनि के माध्यम से इन अभिनेताओं के अभिनय को तराशने का काम भी बखूबी किया। नगर पालिका अधिकारी की भूमिका में मीनू थापा के चेहरे की कुटिलता व मौके की नजाकत भांपते हुये बार-बार रंग बदलने के अभिनय को दर्शको की खास सराहना मिली।

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