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कड़े संघर्ष में तपकर बनाई तरक्की की राह

दिल्ली में उत्तराखंडियत को आगे बढ़ा रहा ललोटना का उपेंद्र
होटल व ट्रेवलिंग के बिजनेस में बनाया मुकाम
घर से खाली हाथ पहुंचा था देश की राजधानी
परिवार को भी संभाला, सफल व्यवसायी भी बना
अब दिल्ली में उत्तराखंड के लोगों का बना मददगार
मुकेश रावत
थत्यूड़ (टिहरी)। मन में कुछ अच्छा कर गुजरने की दृढ़ इच्छाशक्ति और जज्बा हो तो बुरा वक्त भी ज्यादा समय तक आपका रास्ता नहीं रोक सकता है। ललोटना के उपेंद्र गुसाईं ने इसको साबित कर दिखाया है। टिहरी गढ़वाल की पालिगड़ पट्टी के इस दूरस्थ गांव का उपेंद्र 1999 में घर से खाली हाथ निकला था। गुरबत के हालात, परिवार की जिम्मेदारी और पढ़ने की ललक के साथ रोजगार की तलाश ने उसे अपनी माटी़ की शुद्ध आबोहवा व पगडंडियों से निकलकर दिल्ली पहुंचने के लिए मजबूर किया। दिल्ली में भी विकट परिस्थितयों ने घेरे रखा, लेकिन उपेंद्र ने हार नहीं मानी। हौसले की उड़ान को बनाए रखते हुए कड़े संघर्ष में तपकर आखिरकार उपेंद्र ने तरक्की की राह निकाल ही ली। मौजूदा समय में उपेंद्र गुसाईं राजधानी दिल्ली में होटल, हाॅस्पिटलिटी और टुअर एंड ट्रैवल के व्यवसाय में अपना मुकाम बना चुका है।
उत्तराखंड के मूल निवासी व दिल्ली के होटल व्यवसाय उपेंद्र गुसाईं
ललोटना के उपेंद्र का जन्म 1979 में रामचंद गुर्साइं के बेहद साधारण किसान परिवार में हुआ। पांचवीं तक की पढ़ाई उन्होंने गांव में ही की। तंग माली हालत के चलते विकट परिस्थितयों के बावजूद उपेंद्र ने थत्यूड़ से बारहवीं तक की पढ़ाई जैसे-तैसे पूरी की। छोटे-मोटे कामकाज के साथ उच्च शिक्षा के लिए मसूरी पहुंचे तो देवभूमि के हकों की जंग उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया। छात्र जीवन में रहते हुए उन्होंने सक्रिय आंदोलनकारी स्वर्गीय बिजेन्द्र भट्ट एवं अन्य साथियों के साथ आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। मगर, गरीबी की मार के चलते पढ़ाई के साथ आंदोलन में भी सक्रिय उपेंद्र के लिए नौकरी करना भी जरूरी हो गया था। इसी विवशता ने ने उन्हें वर्ष 1999 के अंत में गुरबत के साथ दिल्ली पहुंचा दिया।
दिल्ली में भी बुरा समय साये के साथ उनके चिपका रहा। अपने लिए पढ़ाई के साथ एक अदद रोजगार और परिजनों से जुड़ी जिम्मेदारियों का बोझ उनपर हमेशा भारी रहा। इन विकट परिस्थितियांे में भी उपेंद्र ने हिम्मत नहीं हारी। होटलों व रेस्तरां में हाड़तोड़ मेहनत की नौकरी में दौरान आखिरकार दिल्ली में जाकिर हुसैन यूनिवर्सिटी से स्नातक की डिग्री पूरी की। अब दिल्ली मंे रहकर दूरस्थ गांव में अपने बुजुर्ग माता-पिता व परिवार की देखभाल व उनकी जरूरतों को पूरा करना और रोजगार के साथ ही आगे पढ़ाई को सुचारू बनाए रखना, उपेंद्र के लिए एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई के समान रहा। वर्ष 2000 में शादी के बंधन में बंधने के बाद जिम्मेदारियां और बढ़ गईं। इसके बाद कुछ साल और उपेंद्र के लिए भारी विकट रहे। मगर, ‘हिम्मते मर्दा-मदद ऐ खुदा’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए उपेंद्र ने आखिरकार देश की राजधानी दिल्ली में अपने तरक्की की राह निकाल ही ली।
होटल सेक्टर में ही कड़े संघर्ष के साथ आगे बढ़ते हुए उपेंद्र गुसाईं ने वर्ष 2011-12 से तरक्की की जो राह पकड़ी, उसमें पीछे मुड़कर नहीं देखा। देखते ही देखते उन्होंने हाॅस्पिटलिटी और टुअर एंड ट्रैवल्स सेक्टर में हाथ आजमाते हुए अपना मुकाम बना लिया है। मौजूदा समय में उपेंद्र दिल्ली के पहाड़गंज इलाके में दो बड़े होटल और गुसाईं टुअर एंड ट्रैवल्स एजेंसी का संचालन सफलतापूर्वक कर रहे हैं।
आपके लोकप्रिय वेब न्यूज पोर्टल एवं अखबार उत्तरांचल दीप से खास बातचीत में उपेंद्र ने ललोटना से लेकर दिल्ली के अपने सफर को साझा किया। बकौल उपेंद्र, लगातार साथ चली विपरीत परिस्थितियों ने कई बार उनका हौसला तोड़ा जरूर, मगर हिम्मत नहीं हारी। कड़ें संघर्ष के साथ लगातार आगे बढ़ने के प्रयास करता रहा और आखिरकार देश की राजधानी में अपना मुकाम हासिल करने में कामयाब हो गया।

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