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उत्तराखंड: तलाशे जा रहे कम मतदान के मायने

जीत के दावों के बीच उलझन में भाजपा और कांग्रेस

मोदी मैजिक व एंटी इनकंबेसी की थाह लेना भी मुश्किल

नतीजों का लंबा इंतजार और बढ़ाएगा पार्टियों की बैचेनी

निर्वाचन आयोग की उम्मीदों को भी लगा बड़ा झटका

मदन मोहन लखेड़ा,देहरादून। उत्तराखंड का मतदाता इस बार भाजपा और कांग्रेस ही नहीं निर्वाचन आयोग को भी झटका दे गया है। गुरुवार 11 अप्रैल के जो आंकड़े अभी तक सामने आए हैं, वो मत प्रतिशत में गिरावट का साफ इशारा कर रहे हैं। अभी फाइनल आंकड़ों का इंतजार है, कम मतदान ने भाजपा और कांग्रेस ही नहीं निर्वाचन विभाग को भी उलझन में डाल दिया है। दोनों राष्ट्रीय दल कम मतदान का अपना ही गणित बैठा रहे हैं। अपनी-अपनी जीत के दावे भी ठोक रहे हैं, लेकिन एक सच्चाई छिपाए नहीं छुप पा रही है। कम मतदान को लेकर उलझन और चिंता दोनों को भीतर ही भीतर खाए जा रही है। मोदी लहर या फिर सत्ता विरोधी रूझान, कम मतदान की वजह किसे ठहराएं…समझना मुश्किल हो रहा है। जनता-जर्नादन पर कौन सा ‘अंडर करंट’ दौड़ा, इसकी थाह लेना भी ढेढ़ी खीर बना है। वहीं, अरसे से लगातार मतदाता जागरुकता अभियान समेत तमाम प्रयासों के बावजूद मतदान का यह प्रतिशत निर्वाचन कार्यालय के गले नहीं उतर रहा है। प्रदेश के मदाताओं ने अपना फैसला दे दिया है और इसका खुलासा अब 41 दिन बाद ही हो पाएगा। नतीजों का यह लंबा इंतजार भी सियासी दलों और उनके प्रत्याशियों के लिए बेचैनी व उहापोह भरा तो आम जनता के लिए उबाउ रहेगा।
राज्य निर्वाचन कार्यालय ने गुरुवार शाम पांच बजे तक कुल मतदान प्रतिशत का जो प्रारंभिक आंकड़ा जारी किया, वह रहा 57.85, यानी वर्ष 2014 से लगभग 4.30 प्रतिशत कम है। हालांकि, फाइनल आंकड़े आने अभी बाकी हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि मतदान प्रतिशत में दो से तीन प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। बावजूद इसके मतदान प्रतिशत में ज्यादा बड़े उछाल की संभावना नहीं है। राज्य गठन के बाद उत्तराखंड में यह चैथे लोकसभा चुनाव हैं लेकिन ऐसा पहली बार हुआ कि पिछली बार की अपेक्षा कुछ कम मतदाता पोलिंग बूथ तक पहुंचे। राज्य गठन के बाद वर्ष 2004 के पहले लोकसभा चुनाव में कुल 48.07 प्रतिशत मत पड़े थे। वर्ष 2009 के दूसरे लोकसभा चुनाव में राज्य में कुल 53.43 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। पिछले, यानी वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान राज्य में कुल मतदान प्रतिशत 61.67, यानी 2009 की अपेक्षा 8.24 प्रतिशत की बढ़ोतरी पर रहा।
बहरहाल, अब मतदाता ने अपना फैसला तो दे दिया मगर उसकी चुप्पी ने सियासी पार्टियों और उनके दिग्गजों को परेशानी में डाल दिया है। मतदान में हुई इस गिरावट ने सियासी पार्टियों के साथ ही राजनैतिक विश्लेषकों को भी उलझन में डाल रखा है। मत प्रतिशत में कमी राज्य गठन के बाद पहली बार दर्ज हुई है तो कोई भी इसे लेकर किसी तरह का अनुमान लगाने की स्थिति में नहीं है। हालांकि, हर पार्टी और हर प्रत्याशी कम मतदान को अपने पक्ष में बता रहा है लेकिन कड़वा सच तो यह है कि उन्हें बिल्कुल भी अनुमान नहीं कि आने वाले नतीजे क्या गुल खिलाएंगे। लगभग चार प्रतिशत की यह गिरावट किसे रास आएगा, किसका गणित बनाएगी या बिगाड़ेगी, भाजपा और कांग्रेस कुछ भी समझने की स्थिति में नही है। दोनों ही पार्टियों के इसे लेकर अपने-अपने दावे और तर्क तो हैं, लेकिन इन दावों में दम कितना है, यह 23 मई को चुनाव नतीजे सामने आने पर पता चल पाएगा।

 
वोटर थे ज्यादा, वोट पड़े कम
देहरादून। प्रदेश में 17वीं लोकसभा के लिए अपने सांसद चुनने को इस बार उत्तराखंड के मतदाताओं का आंकड़ा तो ज्यादा था, मगर ईवीएम में वोट कम पड़े। वर्ष 2014 के आम चुनाव के मुकाबले इस बार उत्तराखं डमें 7 लाख से अधिक वोटर ज्यादा थे। हालांकि, इस अनुपात में वोटिंग नहीं हो पाई। निर्वाचन आयोग से मिले अब तक के आंकड़ों के अनुसार राज्य में 78.56 लाख वोटरों में से करीब 45.56 लाख ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। ‘डेमोक्रेसी एंड सिटीजन इंगेजमेंट’ कार्यक्रम के तहत चुनाव का करीबी से अध्ययन करता आ रहे गति फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल की मानें तो 2014 के चुनाव के दौरान प्रदेश में 71.27 लाख मतदाता थे और 43.95 लाख ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। 2019 के चुनाव में प्रदेश में मतदाताओं की संख्या 78.56 लाख के पार तो पहुंची, इनमें से 45.56 लाख लोग ही इस इस बार बूथों तक वोट डालने पहुंचे। इससे साफ है कि पिछले आम चुनाव के मुकाबले प्रदेश में मतदाताओं की संख्या जितनी बढ़ी, उस अनुपात में अधिक वोट नहीं पड़ पाए। मतदाताओं के इस बढ़े हुए आंकड़े 7.26 में से सिर्फ 1.60 लाख ही वोट डालने आगे आए। अनूप नौटियाल का कहना है कि इस बार सियासी दल अपने प्रचार से वोटरों को प्रभावित नहीं कर पाए।

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